- स्वयं पंचांग रचना की विधि l
प्राच्य चिक्रित्सा पद्धति में ऐसी अंतर्दृष्टि विकसित किये जाने का महत्व जिससे अतीत के स्वरूपों को वर्तमान और भावी लक्षणों से तालमेल बैठाने में सहायता मिले । हमेँ रोग के किसी एक स्वरूप को अलग करके नहीं बल्कि पूर्णरूप से देखना चाहिए । यह स्मरण रखना चाहिए कि प्राच्य चिकित्सा प्रणाली से उपचार रोग का नहीं बल्कि रोगी का किया जाता है। किसी एक अंश या अंग का उपचार नहीं क्रिया जाता बल्कि सम्पूर्ण - व्यक्ति का उपचार किया जाता है। पश्चिमी चिकित्सा पद्धति में कारण और परिणाम के सिद्धांत की भूमिका महत्वपूर्ण होती है जबकि प्राच्य पद्धति में एक परिणाम (कार्य ) के कई कारण हो सकते है । अतः हमेँ प्रयास यहीं करना चाहिए कि हम मूल कारण को खोज लें।
हमारा दावा है की इस पुस्तक को पढ़कर आप भविष्यवेत्ता बन जायेंगे और सड़क के किनारे बैठने वाले ज्योतिषयो से ठगे नहीं जा सकेंगे
इस भक्ति में आनंद है
Written by the esteemed astrologer KN Rao
Muhurat Darpan [Hindi] Kundali Darpan [Hindi] - स्वयं पंचांग रचना कीBy Dilip Kumar ' ' " " l , , , , , , l , , , , , , I , I " " " " I